(तर्ज – हाथ पकड़ ले रे कान्हा)
जब से आया मैं खाटू, मेरे काम ये बनते जाते
इधर-उधर से कैसे होता, श्याम ये मेरे कराते॥
पहले मिलने को मैं पैदल ही आया,
दूजी बार उसने गाड़ी में बुलाया,
भटक रहा था कहाँ-कहाँ पर,
श्याम ही बात बनाते॥
जब से आया मैं खाटू, मेरे काम ये बनते जाते…
हाथ निशान लेकर चौखट पर पहुँचा,
बाबा ने मेरे तब आँसू को पोंछा,
ऐसा किया करिश्मा इसने,
लोग ये चक्कर खाते॥
जब से आया मैं खाटू, मेरे काम ये बनते जाते…
लकी को ऐसी जगह मिल गई है,
बाबा की ऐसी कृपा मिल रही है,
खुशियाँ ही खुशियाँ हैं,
जीवन मे भक्त नाचते आते॥
जब से आया मैं खाटू, मेरे काम ये बनते जाते…
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