Surya Sen Biography In Hindi सूर्य सेन की जीवनी

Surya Sen Biography In Hindi

★★★ जन्म : 22 मार्च, 1894, चटगाँव,

★★★ स्वर्गवास : 12 जनवरी, 1934, बंगाल,

★★★ उपलब्धियां :

मास्टर सूर्य सेन जी ने 11 जनवरी को अपने एक मित्र को अंतिम पत्र लिखा था कि- मृत्यु मेरा द्वार खटखटा रही है। मेरा मन अनंत की और बह रहा है। मेरे लिए यह वो पल है, जब मैं मृत्यु को अपने परम मित्र के रूप में अंगीकार करूँ। इस सौभाग्यशील, पवित्र और निर्णायक पल में मैं तुम सबके लिए क्या छोड़ कर जा रहा हूँ? सिर्फ़ एक चीज़ – मेरा स्वप्न, मेरा सुनहरा स्वप्न, स्वतंत्र भारत का स्वप्न। प्रिय मित्रों, आगे बढ़ो और कभी अपने कदम पीछे मत खींचना। उठो और कभी निराश मत होना। सफलता अवश्य मिलेगी। अंतिम समय में भी उनकी आँखें स्वर्णिम भविष्य का स्वप्न देख रही थीं।

Surya Sen Biography In Hindi

सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले प्रसिद्ध क्रांतिकारियों और अमर शहीदों में गिने जाते हैं। भारत भूमि पर अनेकों शहीदों ने क्रांति की वेदी पर अपने प्राणों की आहुति देकर आज़ादी की राहों को रोशन किया है। इन्हीं में से एक सूर्य सेन नेशनल हाईस्कूल में उच्च स्नातक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे, जिस कारण लोग उन्हें प्यार से मास्टर दा कहते थे। चटगाँव आर्मरी रेड के नायक मास्टर सूर्य सेन ने अंग्रेज़ सरकार को सीधे चुनौती दी थी।

सरकार उनकी वीरता और साहस से इस प्रकार हिल गयी थी की जब उन्हें पकड़ा गया, तो उन्हें ऐसी हृदय विदारक व अमानवीय यातनाएँ दी गईं, जिन्हें सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। गुरिल्ला युद्ध का निश्चय:वर्ष 1923 तक मास्टर दा ने चटगाँव के कोने-कोने में क्रांति की अलख जगा दी। साम्राज्यवादी सरकार क्रूरतापूर्वक क्रांतिकारियों के दमन में लगी हुई थी। साधनहीन युवक एक ओर अपनी जान हथेली पर रखकर निरंकुश साम्राज्य से सीधे संघर्ष रहे थे तो वहीं दूसरी और उन्हें धन और हथियारों की कमी भी सदा बनी रहती थी।

इसी कारण मास्टर सूर्य सेन ने सीमित संसाधनों को देखते हुए सरकार से गुरिल्ला युद्ध करने का निश्चय किया और अनेक क्रांतिकारी घटनाओं को अंजाम दिया। उन्हें पहली सफलता तब मिली, जब उन्होंने दिन-दहाड़े 23 दिसम्बर, 1923 को चटगाँव में आसाम-बंगाल रेलवे के ट्रेजरी ऑफिस को लूटा। किन्तु उन्हें सबसे बड़ी सफलता चटगाँव आर्मरी रेड के रूप में मिली, जिसने अंग्रेज़ सरकार को झकझोर कर रख दिया। यह सरकार को खुला सन्देश था की भारतीय युवा मन अब अपने प्राण देकर भी दासता की बेड़ियों को तोड़ देना चाहता है।

सैनिक शस्त्रागार की लूट:पूर्व योजनानुसार 18 अप्रैल, 1930 को सैनिक वस्त्रों में इन युवाओं ने गणेश घोष और लोकनाथ बल के नेतृत्व में दो दल बनाये। गणेश घोष के दल ने चटगाँव के पुलिस शस्त्रागार पर और लोकनाथ जी के दल ने चटगाँव के सहायक सैनिक शस्त्रागार पर कब्ज़ा कर लिया। किन्तु दुर्भाग्यवश उन्हें बंदूकें तो मिलीं, किंतु उनकी गोलियाँ नहीं मिल सकीं। क्रांतिकारियों ने टेलीफ़ोन और टेलीग्राफ़ के तार काट दिए और रेलमार्गों को अवरुद्ध कर दिया। एक प्रकार से चटगाँव पर क्रांतिकारियों का ही अधिकार हो गया। तत्पश्चात यह दल पुलिस शस्त्रागार के सामने इकठ्ठा हुआ, जहाँ मास्टर सूर्य सेन ने अपनी इस सेना से विधिवत सैन्य सलामी ली, राष्ट्रीय ध्वज फहराया और भारत की अस्थायी सरकार की स्थापना की।

अंग्रेज़ सैनिकों से संघर्ष:इस दल को अंदेशा था की इतनी बड़ी घटना पर अंग्रेज़ सरकार तिलमिला जायेगी, इसीलिए वह गोरिल्ला युद्ध हेतु तैयार थे। इसी उद्देश्य के लिए यह लोग शाम होते ही चटगाँव नगर के पास की पहाड़ियों में चले गए, किन्तु स्थिति दिन पर दिन कठिनतम होती जा रही थी। बाहर अंग्रेज़ पुलिस उन्हें हर जगह ढूँढ रही थी। वहीं जंगली पहाड़ियों पर क्रांतिकारियों को भूख-प्यास व्याकुल किये हुए थी। अंतत: 22 अप्रैल, 1930 को हज़ारों अंग्रेज़ सैनिकों ने जलालाबाद पहाड़ियों को घेर लिया, जहाँ क्रांतिकारियों ने शरण ले रखी थी। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी क्रांतिकारियों ने समर्पण नहीं किया और हथियारों से लेस अंग्रेज़ सेना से गोरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।

इन क्रांतिकारियों की वीरता और गोरिल्ला युद्ध-कोशल का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस जंग में जहाँ 80 से भी ज़्यादा अंग्रेज़ सैनिक मरे गए, वहीं मात्र 12 क्रांतिकार ही शहीद हुए। इसके बाद मास्टर सूर्य सेन किसी प्रकार अपने कुछ साथियों सहित पास के गाँव में चले गए। उनके कुछ साथी कलकत्ता (वर्तमान कोलकाता) चले गए, लेकिन इनमें से कुछ दुर्भाग्य से पकडे भी गए।अंग्रेज़ पुलिस किसी भी तरह से सूर्य सेन को पकड़ना चाहती थी। वह हर तरफ़ उनकी तलाश कर रही थी।

Surya Sen Biography In Hindi

सरकार ने सूर्य सेन पर दस हज़ार रुपये का इनाम भी घोषित कर दिया। जब सूर्य सेन पाटिया के पास एक विधवा स्त्री सावित्री देवी के यहाँ शरण ले रखी थी, तभी 13 जून, 1932 को कैप्टेन कैमरून ने पुलिस व सेना के साथ उस घर को घेर लिया। दोनों और से गोलीबारी हुई, जिसमें कैप्टेन कैमरून मारा गया और सूर्य सेन अपने साथियों के साथ इस बार भी सुरक्षित निकल गए। इतना दमन और कठिनाइयाँ भी इन क्रांतिकारी युवाओं को डिगा नहीं सकीं और जो क्रांतिकारी बच गए थे, उन्होंने दोबारा खुद को संगठित कर लिया और अपनी साहसिक घटनाओं द्वारा सरकार को छकाते रहे। ऐसी अनेक घटनाओं में वर्ष 1930 से 1932 के बीच 22 अंग्रेज़ अधिकारी और उनके लगभग 220 सहायकों की हत्याएँ की गयीं।

 

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