Chanakya Niti Hindi Mein – ये तीन कार्य करने वाला हमेशा दुखी रहता है।

Chanakya Niti Hindi Mein – तीन कार्यों को करने वाला व्यक्ति जिंदगी में कभी भी सुख नहीं मिलता।

तीन कार्यों को करने वाला व्यक्ति, पंडित ज्ञानी एवं कुशल होने पर भी अवश्य दुख पाता है, रोता है यह तीन कार्य है-

  1. मूर्ख किस को उपदेश देना,
  2. दुष्ट स्त्री का पालन पोषण करना।
  3. दुखी लोगों के साथ रहना।

आचार्य ने चार स्थितियों को बिना किसी समस्या के मृत्यु के रूप में बताया है यह चार स्थितियां हैं- ऐसा व्यक्ति जिसकी पत्नी दुष्टा हो, जिसका मित्र सठ यानी मूढ़ हो तथा जिसका निवास सांपों के रहने वाले घर में हो। इस तरह आचार्य इन स्थितियों से बचने का परामर्श देते हैं। सामान्यता बुद्धिमान उसे ही कहा जाएगा जो इन से बचें। जिस राज्य में – लोक जीवन अर्थात आजीविका के साधन ना हो, नागरिकों में शासन का भय ना हो उद्दंड भाव से विधि विरुद्ध आचरण करते हो, लोग लज्जा तथा मर्यादा से ही जीवन जीते हो तथा उनमें दान और त्याग की भावना न हो वहां (अर्थात ऐसे राज्य में) निवास नहीं करना चाहिए।

Aacharya Chanakya Niti Hindi Mein

व्यक्ति को जीवन में कष्ट और असुविधा उठाकर भी आपत्ति विपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करनी चाहिए। धन का संग्रह अत्यंत आवश्यक है क्योंकि किसी भी संकट से मुक्ति दिलाने में धन का महत्वपूर्ण योगदान रहता है। अपनी आय को पूरा खर्च कर देना बुद्धिमानी नहीं है, कुछ ना कुछ बचा कर रखना जरूरी है। धनहीन व्यक्ति की समाज में कोई प्रतिष्ठा नहीं होती है। अतः कष्ट सहन करके भी धन की रक्षा करना उचित है।

इसी तरह यदि पत्नी पर किसी प्रकार का संकट आ जाए, उसकी बीमारी पर खर्च करना पड़ जाए, तुम देती को धन के प्रति मोह नहीं दिखाना चाहिए। किंतु स्वयं की रक्षा धर्म पत्नी की अपेक्षा अधिक ध्यान देकर करनी चाहिए। यहां इस बात का कोई संकुचित अर्थ लगाने की आवश्यकता नहीं है कि अपनी रक्षा से अधिक कुछ भी नहीं है वरन् से इस दृष्टि से भी देखना चाहिए की स्वयं का होना ही धन एवं पत्नी का धन एवं पत्नी के रूप में बना रहता है। साथ ही, स्वयं की रक्षा के प्रति हर प्राणी को सबसे अधिक दायित्व प्रकृति के नियम निर्धारित किया है, इस अर्थ में भी यह नीति सुंदर है।

यह माना जाता है कि दुख, संकट और कष्ट, गरीब व्यक्ति के साथी हैं, धनी व्यक्ति को इन से क्या लेना देना? धनवान व्यक्ति तो अपने धन की शक्ति से सभी दोस्तों और कष्टों से सहज ही मुक्ति पा सकता है। किंतु लक्ष्मी चंचल है संग्रह करने पर भी नष्ट हो जाती है।

मनुष्य को उस क्षेत्र में अपना निवास कभी नहीं बनाना चाहिए जहां व्यक्ति के गुणों को महत्व नहीं दिया जाता, अर्थात गुणी व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलता, जहां अजीब का के साधन नहीं है, जिस क्षेत्र में अपने बंधु बांधव नहीं रहते, तथा जिस क्षेत्र में ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा नहीं है।

इस श्लोक में आचार्य किसी लोकोत्तर करुणा या दया की ओर संकेत ना करके मात्र व्यक्ति को पीड़ित होकर रोने से बचाने के लिए तीन बातों को निषेध करने को कहते हैं। यहां यह बात फिर से पुष्ट होती है कि आचार्य केवल यह लोग के हित की कामना से या ग्रंथ रच रहे थे। 

जिस नगर में निम्न में से पांच विद्यमान नहीं रहते हैं, वहां बुद्धिमान व्यक्ति को 1 दिन भी नहीं बिताना चाहिए। उसे तत्काल छोड़ देना चाहिए: जैसे- धनिक, राजा, क्षेत्रिय ब्राह्मण, नदी तथा डॉक्टर।

आचार्य विभिन्न प्रकार के संबंधों के परीक्षण का सूत्र बताते हुए कहते हैं कि सेवकों को योग्यता तथा स्वामी भक्त की परख उन्हें सौंपे गए कार्य के करने की सामर्थ्य से होती हैं। सगे संबंधियों के अपने प्रति लगाओ कि परख संकट की स्थिति में की जाती है। सच्चे अर्थों में बंधु बांधव वही हैं, जो दुख संकट में साथ नहीं छोड़ते। मित्र की पहचान भी विपत्ति पड़ने पर होती है सच्चा मित्र सुख दुख में एक समान साथ निभाता है।

वैभव के छेड़ होने पर, राजा और रंक बन जाने पर पत्नी की पति- परायणता की परख होती है। दरिद्र हो जाने पर गोस्वामी तुलसीदास जी का कथन है- धीरज, धरम, मित्र अरु नारी, आपत्तिकाल परखिए चारी।

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